चीत्कार

अभी पढ़ा देखा सुना कि एक तीन साल की बच्ची के साथ रेप हुआ, और ये कोई आज की खबर नहीं है हर रोज कोई ऐसी खबर दिल दहला देती है, सोच कर भी खौफ आता है।

इतनी छोटी बच्ची के साथ ऐसा करने वाले, ये कैसे राक्षस है, ओह-ओह उनहे एक मासूम बच्ची में भी सिर्फ औरत का जिस्म नजर आता है।

जिम्मेदार अकेला वो नहीं ये समाज भी है, उसकी माँ है, उसका परिवार है, हमारी फिल्में है ,जिनमें बलात्कार के दॄशय आवशयक है, हिट फिल्म का फार्मूला “रेप सीन”।

इंटरनेट ने तो जैसे हाथों में बम दे दिये हैं, सब खुला, मनोरंजन के नाम पर वो सब दिखाते हैं, जो कभी बन्द दरवाजों के पीछे की कहानियाँ थी ।

कहने को तो बहुत कुछ है, पर बस इतना ही कहूँगी ।वो करें जो हमारे हाथ में है, लडके को पैदा करना ही महानता नहीं है, उसे एक अच्छा इंसान बनाये, उसे किसी माँ के दिल की तड़प ना बनने दे ।

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तड़प उस माँ के दिल की, कैसे कम हो

जिसकी मासूम बच्ची का हुआ, चीर हरण हो

कैसे भरेगा वो जख्म, जब उसने देखा होगा

अपनी बच्ची का नग्न, रक्तरंजित बदन

हर रोज सुनते है, जाने कितने बलात्कार की खबरें

किसी को उसके अपने ने रौंदा,

कोई अजनबी का शिकार बनीं

वो तो अल्हड़ भी न हुई थी

अभी मासूम ही थी, जिसे उठा ले गया कोई

जिसे ये भी ना पता था, कि मर्द होता कया है

उसके लिए तो मर्द अभी बस

एक पिता ,एक भाई ही था, कोई अपना ही है

उसे क्या पता हवस क्या होती है।

वो तो अभी तक माँ की गोद में ही सोती है

उसे रौद डाला, ये कैसी शैतानियत है

आदमी के जिस्म में, बस गई हैवानियत है

जब बलत्कार की खबरें आती है सामने

लोग बड़ी बड़ी बातें लगते हैं बखानने

लड़कियाँ जिम्मेदार होती है ।

इन घटनाओं की,उनके भड़काऊ कपड़े

उनके, नखरे, उनका फैशन

कोई उनसे ये पूछे,कि जब

तीन, चार और पांच साल की

बच्चियों का बलात्कार होता है

तो उनहोंने क्या, जिस्म दिखाया होता है

उनहोंने कैसे एक आदमी को, भडकाया होता है

उसका क्या कुसूर है ?

उसकी किस अदा से ,आदमी पर चढता सुरूर है

ये कैसी मानसिकता है, ये कैसा पागलपन

के एक बच्ची जिसने,होश भी ना अभी संभाला

तुमने अपनी हवस का शिकार बना डाला

उफ्फ्फ ये कैसे कर सकता है कोई ?

जानवर से भी नीचे कैसे गिर सकता है कोई

पर एक सवाल जो, अकसर मुझे सताता है

ऐसे लोगों में ये, जानवर कहाँ से आता है

बलात्कारी पैदाइशी तो नहीं होते

उनका माहौल असर डालता होगा

उनकी परवरिश में कहीं कमी होगी

जब बेटे पैदा करती है माँ

तो फूली नहीं समाती है ।

बधाइयाँ बांटती है, दावतें करवाती है

और यही बेटा जब, दामन दागदार करे किसी का

तो क्यो ना उसे जिंदा जला देती है ।

क्यों वो सिर्फ बेटा पैदा करके

मुक्त हो जाती है, अपने उत्तरदायित्व से

क्यो नहीं बताती, उसे सही और गलत

क्यों नहीं बनाती, उसे एक अच्छा इंसान

क्यो नहीं सिखाती, औरत की इज्जत करना

क्यों नहीं बताती उसे …..

औरत और बच्ची के बीच का फर्क

काश ! सिर्फ बेटा पैदा करके खुश ना होती

बेटे को ये सब सिखला पातीं ।

तो फिर ये नन्ही जानें, यूं बार बार ना रौंदी जाती

जब कोई दोषी आता है सामने

हम दुनिया की सबसे बड़ी सजा, चाहते हैं उसके लिए

सजा तजवीज करने से कया होगा ?

अब ये सच हमे समझना होगा

घर से ही शुरूआत करनी होगी

अपने बेटों से बात करनी होगी

उनकी परवरिश में ये कमी ना रहें

कि फिर कोई मासूम, इस गलती की सजा पाए

फिर कोई बच्ची हमारी गलती की सजा पाए

और फिर किसी मासूम की चीखें

हमारी दिल की चीत्कार बन जाए !!!!

मेरे हाथ

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बेरंग से हो चले है अब हाथ मेरे

अब वो पहले सी नरमी ना रही

कुमलहा से गए हैं

जिंदगी के ताप में

देखती हूँ जब जब

याद आते है, वो कच्चे से नन्हे हाथ मुझे

जिनसे माँ की उंगली पकड़, चलना सीखा

उन नाजुक नर्म हाथों से

पापा के चेहरे को छूना

फिर उन्ही नन्हे हाथों में

मास्टर जी से पेन्सिल पकड़ कर लिखना सीखना

इन्ही हाथों से स्कूल बैग उठा के चलना

फिर साइकिल पकड़ कॉलेज के लिए निकलना

माँ के हाथों से सीखा

इन हाथों ने खाना बनाना

इन हाथों के हुनर से ही

दुनिया ने मुझे पहचाना

एक दिन अपने इन खूबसूरत हाथों से

पिया जी का हाथ थाम

एक नई दुनिया में कदम रखना

घर गृहस्थी की बागडोर अपने

नाजुक हाथों में लेना

अपने इन्ही हाथों से

अपने बच्चो को गोद मे उठाना

उनहे अपनी उंगली पकड़ कर चलना सिखाना

इन्ही हाथों से उनकों पालना पोसना

सब हाथों ही के तो काम थे

थक गए ये हाथ भी अब

इनमें वो जान नहीं रही

रात दिन काम किया इनसे

अब इनको थकान होने लगी

सारी जिंदगी बस करते ही तो रहे हैं

इनको आराम कहाँ है

सखतियों ने जिंदगी की

इन्हे सख्त बना दिया है

नरमियों को इनकी वक्त खा गया है

हाथों की जिंदगी में बड़ी कीमत है

हुनर इनमें है, तो जिंदगी खुबसूरत है

कभी खुबसूरत ये हाथ अब रंग खो चुके हैं

जिम्मेदारियों मे घिस कर, बेरंग हो चुके है

फिर भी इनमें जीने की एक लगन है अभी

सबके लिए किया अब तक,अब थोड़ा कुछ

मेरे लिए भी करते हैं

मेरी थकान में खुद ही मुझे

सहला लिया करते हैं

इन हाथों से जीवन है मेरा

मुझे प्रेरणा देते है

मै जो बिखरूं जरा अगर

ये मुझे थाम लिया करते है

सुन्दर न सही, न पहले सी चमक है

पर मेरे इन्ही हाथों से

मेरे व्यक्तित्व की धनक है

हाई फाई शादियां

एक शब्द जो अकसर सुनने में आता है, ” हाई फाई ” आम भाषा में लोग हाई सोसाइटी के लिए प्रयोग करते है ।

भाई हाई -फाई लोग हैं … दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है, उतनी तेजी से लोगों के शौक भी, और शौकों को पूरा करने की अब कोई निर्धारित सीमा नहीं रही अब ….

पहले भी शादियां होती थी, पर इतने दिखावे नहीं थे, जैसे जैसे महंगाई बढ रही है वैसे खर्च भी बढ रहे हैं …. और दिखावे तो आपकी सोच की सीमाओं से परे हो चले हैं ….

हर इंसान चाहता है वो एक सुख सुविधाओं से परिपूर्ण जिंदगी जिये … पर आपको नहीं लगता शौक के नाम पर हमने अपने खर्चे कुछ जयादा ही बढा लिए है ।

शादीयों के नाम पर इतने अनावश्यक खर्च होने लगे हैं कि एक आम इंसान इस दिखावे के चक्कर में कया करे और कया ना करे समझ ही नहीं पाता ….

कपड़े, जवैलरी सब डिजाइनर, शादी के हर फंक्शन के लिए अलग रंग की पोशाके बनती है … जो बाद में हमारी वार्डरोब की शोभा बढाती है ,कयोकि लाखों की कीमतों के वो कपड़े हम फिर दूसरे किसी आयोजन मे नहीं पहनते …. अब जो सक्षम हैं, उनहे कोई दिक्कत नहीं, पर मध्यम वर्ग शिकार बनता जा रहा है इस दिखावे का … क्यो ये इतना दिखावा, क्यो लोग चादर से जयादा पैर फैलाते है ,ये मुहावरा और इसका अर्थ दोनों का मतलब भी शायद याद नहीं अब किसी को …. बहुत अलग सी मान्यताओ के साथ जीने लगे हैं लोग, परिणाम की परवाह किए बगैर । #Myquote #MyPoems #mythoughts #marriages #expenses #society #changes

हाइ-फाइ शादियां ……..

बहुत खुबसूरत एक शादी का कार्ड आया है

संग में खुशबुदार मेवा भिजवाया है

फाईव स्टार होटल मे इंतजाम करवाया है

बाहर से वेडिंग पलानर बुलवाया है

बन्दे ने करोड़ों का बजट बनाया है

मेहमानों के लिए ड्रेस कोड बतलाया है

हल्दी के लिए पीले,मेहदी के लिए हरा

काकटेल पार्टी के लिये काला

और संगीत के लिए लाल रंग के कपड़े

पहन के आना है,ये बतलाया है

सजावट के फूल विदेशी होंगे

मेहमानों के लिए विदेशी फल मंगवाया है

क्यो न करें भईया ये सब पैसे की माया है

पांच, सात करोड़ तो आजकल छोटे बजट में आया है

पर कितना जरूरी है, या गैर जरूरी तमाशा

घोड़ी के जगह दूल्हे का , हेलिकॉप्टर में आना

लोग दांतों तले उंगली दबाते हैं

जब ऐसी शादियों में जा कर आते हैं

आकर घरों में बताते हैं, गजब का इंतजाम था

हाई -टी में ही सौ चीजें थी

काकटेल में मनचाही शराब

स्नेकस और खाने की तो पूछिये नहीं

ये कहिये की, कया नहीं था जनाब

घर में डाईट का पूरा धयान रखने वाले हम

कुछ घंटों मे कितना कुछ खा जाते हैं

फिर भी आधे से जयादा चीज चखने से रह जाते हैं

कहीं इंसान को एक वक़्त की रोटी नसीब नहीं

कहीं न जाने कितना खाना, लोग झूठे मे गिरा आते हैं

मुझे तो लगता है ऐसी जगहों पर

हम अपने पेट को डस्टबिन बना के ले जाते हैं

जो सक्षम हैं, वो करते हैं, हाइ -फाइ शादियां

उसमे कोई बुराई नहीं है

चलो मान लेते हैं, इसमें कोई दोराय नहीं है

पर जो नहीं है इतने धनवान

कहाँ ले जाएँ वो अपने अरमान

उनके अरमान ,उन्हे बहुत उकसाते है

अपनी बारी आने पर वो भी अपने बच्चो के लिए

जयादा से जयादा करना चाहते है

दिखावे की मार से खुद को नहीं बचा पाते हैं

या तो हीन भावना में जीते हैं

या कुछ करने की कोशिश मे, कर्ज में डूब जाते हैं

क्यो नही समाज कुछ आवशयक नियम बनाता

हर आदमी एक सामान्य जिंदगी जीने पाता

एक रात में करोड़ों रुपये फूंक देने से बढिया

उनहे अपने बच्चो के नाम करवाता

उनके भविष्य मे काम वो पैसा बहुत काम आता

कुछ हंसेगें कुछ मुसकुरएगें,

जब कविता पढेंगे मेरी

मेरी बातों से इत्तेफाक नहीं रख पायेंगे

पर एक बार सोचियेगा जरूर

कया जरूरी है ? शादियों मे इतने दिखावे करना

शादी के लिए तो जरूरी है, महज दो दिलों का मिलना

जिस दिन ये हकीकत हम समझ पायेंगे

एक नये स्वस्थ समाज का पुनः निर्माण कर पायेंगे …..